8 जुलाई 2020 - 13:22
कोराना संकट के दौरान, स्कूलों में पढ़ाई का बोझ कम करने के बहाने लोकतांत्रिक सोच और धर्मनिरपेक्षता पर वार

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने कोविड-19 महामारी के दौरान पढ़ाई का बोझ कम करने के बहाने स्कूलों में 2020-21 के शिक्षा सत्र में सिलेबस से धर्मनिरपेक्षता, नागरिकता, लोकतांत्रिक अधिकार, संघवाद, राष्ट्रवाद और फ़ूड सिक्योरिटी जैसे महत्वपूर्ण चैप्टर हटा दिया हैं।

CBSE ने छात्रों के ऊपर सिलेबस का बोझ कम करने के लिए स्कूलों में 30 फ़ीसदी कोर्स कम करने की घोषणा की थी, जिसके बाद सिलेबस से कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ चैप्टर्स हटाने का फ़ैसला किया गया है। शिक्षा संस्थानों से जुड़े और इन विषयों के कई जानकारों और विशेषज्ञों ने बोर्ड के इस क़दम का विरोध किया है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, इसके अलावा सिलेबस से ‘हमें स्थानीय सरकारों की ज़रूरत क्यों है?’ और ‘भारत में स्थानीय सरकार का विकास’ जैसे चैप्टर भी हटा दिए गए हैं। अब यह विषय किताबों में मौजूद नहीं रहेंगे।

बोर्ड का कहना है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों पर इन विषयों को हटाया गया है। मंत्रालय ने 9वीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक के सिलेबस को 30 प्रतिशत तक कम करने के लिए कहा था।

कोरोना वायरस संक्रमण के चलते देशभर के विश्वविद्यालय और स्कूल 16 मार्च से बंद हैं, जबकि कुछ स्कूलों ने ऑनलाइन क्लासों का आयोजन जारी रखा है।

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के इस क़दम पर NCERT के पूर्व डायरेक्टर कृष्ण कुमार ने एनडीटीवी से बात करते हुए कहा कि किताबों से इतने महत्वपूर्ण चैप्टर्स को हटाकर बच्चों के पढ़ने और समझने के अधिकार को छीना जा रहा है। 'सरकार ने जिन चैप्टरों को हटाने का फ़ैसला किया है, उसमे अंतर्विरोध है।

एनडीटीवी के मुताबिक़, CBSE क़िताबों के सह-लेखक और पॉलिटिकल साइंटिस्ट सुहास पल्शिकर ने भी इस क़दम की आलोचना करते हुए कहा है कि कुछ ऐसे चैप्टर्स डिलीट किए गए हैं जो डाइवर्सिटी (विविधता) के विचार से जुड़े हैं, जैसे जेंडर और फ़ेडरलिज्म। डाइवर्सिटी किसी भी लोकतंत्र की आत्मा होती है। अगर डाइवर्सिटी से जुड़े चैप्टर हटाए जाते हैं तो डेमोक्रेसी की सोच को चोट पहुंचती है।